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Kah do ki ye sab jhoonthaa hai

मेरे अल्फाज़

कह दो कि ये सब झूठा है

satendra kumar

116 कविताएं

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एक बंजारे की हस्ती को
एक बंजारे की बच्ची को 
कुछ पढ़े-लिखों ने लूटा है  
कह दो कि ये सब झूठा है 
 
छल-बल के ऐसे रूप देख 
संतों की ऐसी भूँख देख 
अब रब भी हमसे रूठा है 
कह दो कि ये सब झूठा है

मंदिर में रब की मूरत थी 
और वहीँ आशिफ़ा बेबस थी  
एक पत्थर दिल कब टूटा है 
कह दो कि ये सब झूठा है

करें तमाशा घूम-घूम 
हम रहे यहाँ हैं झूम-झूम 
कुछ लोग क्रिकेट के दीवानें 
कुछ लोग धरम के दीवाने 
कुछ लोग भरम में जीते हैं 
कुछ लोग शरम से मरते हैं 
कुछ लोग बेग़ारी ढोते हैं 
कुछ लोग शिकारी होते हैं 
इंसान बड़ा मजबूर यहाँ 
दिल्ली है अब भी दूर यहाँ 
ये कोर्ट कचहरी हैं उनके
जेबों में पैसे हैं जिनके
कुछ लोग हैं जुमलेबाज बड़े
कुछ लोग हैं हमलेबाज बड़े
वो सिंघासन पर रहे अड़े
हम लोग वहीं के वहीं खड़े
एक वर्ग ज़श्न में डूबा है 
गुस्सा गलियों में फूटा है 
कह दो कि ये सब झूठा है

संसद में कितने हत्यारे, संसद में कितने गुंडे हैं 
जो चुनाव के मौसम में अजमाते सब हथकंडे हैं 
वो कुपढ़ वहाँ पर बैठे हैं, 
हम पढ़-लिखकर सब ऐसे हैं 
सत्ता उनकी मेहबूबा है  
हर बार हमीं को लूटा है 
कह दो कि ये सब झूठा है

वो बिलियन ट्रिलयन ले भागे
यहाँ तनिक क़र्ज़ पे तन त्यागे
करते किसान कम मेहनत क्या
इनकी अब नहीं ज़रूरत क्या
कैसा सरकारी सिस्टम हैं
फ़सलों के दाम न्यूनतम है
सोता किसान ही भूख़ा है
कह दो कि ये सब झूठा है

क़ुदरत को मार गिरा आए
तुम बाँध बनाकर क्या पाए
जल मग्न धरा, कहीं बंजर है
नदियों का रूप समंदर है
कहीं बाढ़ बड़ी, कहीं सूखा है
कह दो कि ये सब झूठा है

है हुयी तरक़्क़ी शर्तों पर
जी रहा आदमी क़िस्तों पर
क्यूँ नहीं एक सी शिक्षा है
किस दिन की रही प्रतिक्षा है
खो दिया बहुत, पाया कुछ है
सौ बातों का कड़वा सच है
कुछ न कुछ पीछे छूटा है
कह दो कि ये सब झूठा है

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