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मेरे अल्फाज़

माँ का दर्द

Sarvesh Kumar

2 कविताएं

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कितने बहते लहू को पी लूं सब तो मेरे अपने है,
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सब तो मेरे सपने है।

एक भी पत्थर पड़ता है तो, मेरी छाती छलनी है,
कश्मीर हो या यूपी, आखिर में मुझे ही जलनी है।

आग लगे या पत्थर चले, होता सब मेरे आंचल में,
किस किस को मैं समझाऊ, हलचल होता मेरे मन में।

माना मेरे दो बेटे है, एक देव तो दूजा दानव है,
यही दर्द होता है मां की, फिर भी दोनों मेरे जान है।

सिसक सिसक के मैं रोती हूं, जब भी होते ये लहूलुहान,
ये तो सिर्फ एक मां ही जाने, कितना बुरा ऐसा इम्तिहान।

पता नहीं खत्म कब होगा, जुल्मों और जेहादों का चरण,
या अंतिम समय तक एक मां का ही होगा चिर हरण।

और नहीं तो क्या कहूं, नारी हूं मां का दर्द बताती हूं,
पौरुष चाहे जितना हो तुम में, मैं ही तो तुम्हें समझाती हूं।

कितना कहूं, कितना बयां करू सब दर्द तो अपने है।
अंततः अब चुप देखती हूं, कब तक लहू अब बहते है।

-सर्वेश कुमार


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