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Koi Puchhe Mujhse Meri Diwangi Ka Alam

मेरे अल्फाज़

कोई पूछे मुझसे मेरी दीवानगी का आलम

Saroj Yadav

69 कविताएं

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कोई पूछे मुझसे मेरी दीवानगी का आलम
खुद ही तुम्हे बनाऊं और तुझमे डूब जाऊं

तुम्हें मेरी चाहतों का कोई इल्म हो न शायद
तेरे रू-ब-रू जो आऊं तो मैं खुद को भूल जाऊं

तुमने मेरे जहाँ पर कब्जा सा कर लिया है
दे दो जो तुम इजाजत तो मैं आशियां बनाऊं

तुम्हें भूल जाऊं क्योंकर तुम हो मेरी तमन्ना
जीने का फिर मजा क्या मकसद जो भूल जाऊं

कभी आके दिल से पूछो मेरे दिल मे क्यों बसे हो
दिल को तुम्ही संभालो मैं भी बीच मे न आऊं

तन्हाइयों का आलम होता है ख्वाब जैसा
तेरा करूँ तसव्वुर करूँ और तुझमे डूब जाऊं

ऐ काश हो कभी की तुझे याद मेरी आये
तुमने मुझे सताया मैं तुमको भी सताऊं

मैं छोड़ जाऊं दुनिया तुम उससे पहले आना
मेरी आखिरी तमन्ना तो मैं पूरी करती जाऊं

तेरे हाथ मे मैं दुंगी मेरी सारी मिल्कियत को
मेरे बाद मेरे दिल को तेरे हाथ सौंप जाऊं

आना तुम उस जहां में मेरी निसानी लेकर
तुझे देखते ही जिससे मैं तुझसे मिलने आऊं

मिलना तो इस तरह से कभी दर्द न हो दिल को
रहे बन के एक तब हम मैं खुद को भूल जाऊं

- सरोज यादव 'सरु'

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