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Jakhm

मेरे अल्फाज़

हमारी पाठक सरोज के कहा, न पास आएं वो और दूर हमें जाते न बने

Saroj Yadav

69 कविताएं

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उन्हें जो ज़ख़्म दिखाए बड़ा कुसूर किया
वो एक निगाह भी डाले नहीं और चलते बने
दर्द पर मेरे अब आने लगी है उनको हंसी
प्यार से अब उन्हें मरहम कोई देते न बने
कोई मजबूर भी इतना तो न हो जाए कभी
मरना तो चाहे मगर कैसे भी मरते न बने
क्या गजब जख्म है दिखता नहीं जमाने को
जिसको दिखता है उसे अब तो दिखाते न बने
हम चले जायेंगे ये राह खत्म होगी कभी
हमसे दुनिया में अब जीने के बहाने न बने
लाख कोशिश भी किसी काम कहाँ आती है
न पास आएं वो और दूर हमे जाते न बने
न जख्म उनको मिले दर्द भी सहना न पड़े
मैंने ग़म ले लिए खुशी में तेरा ठिकाना बने

- सरोज यादव 'सरु'

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