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Bhula Do Sare Afasane

मेरे अल्फाज़

भुला दो सारे अफसाने

Saroj Yadav

285 कविताएं

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कभी मैं खिलखिलाती हूं
उदासी है कभी मुझमें
कभी गाने को जी करता
कभी पानी है आंखों में

समझ आता नहीं आखिर
तुम्हारा ये असर है कैसा
न बोलो तो ग़मों गुस्सा
जो बोलो तो दीवाली है

मैं चाहूं लाख समझाना
समझना मन नहीं चाहे
तुम्हें सोचा करे हरदम
यही आदत बना ली है

बहारों का बयां क्या है
नजर देखे तो मालूम हो
तुम्हीं बसते हो नजरों में
नहीं दुनिया ही खाली है

जरा भी वक्त मिल जाये
तो जख्मों को मेरे देखो
कभी तुम देखोगे आकर
तभी ये सूरत निकाली है

जमाने की सभी उलझन
कभी क्या खत्म होती है
ये दुनिया ग़म से खाली है
न तरकीबों से खाली है

भुला दो सारे अफसाने
जो जंजीरों की मानिंद हैं
परिंदों की तरह उड़ जा
तो फिर दुनिया निराली है

चलो हम साथ चलते हैं
किनारा खोजना ही है
सफर आसान ही होगा
तो क्यों दूरी बना ली है

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