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मेरे अल्फाज़

प्यार में मजबूर

Sarla Singh

287 कविताएं

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बिन बुलाए तेरी महफिल मे चला आया हूँ
होकर दिल से मजबूर चला आया हूँ
इज्जत चौखट पे सम्मान घर पे छोड़ आया हूँ
होकर दिल से मजबूर चला आया हूँ
लगाओ हजार तोहमते मुझ पर
कसो हजारो तंज मुझ पर
मै खामोश सब सुनता रहुगा
कंठ आवाज के दबा आया हूँ
खुद्दारी कही भुल आया हूँ
होकर दिल से मजबूर चला आया हूँ
ये जो गैरो के पहलु मे बैठकर हस रहे हो
खन्जर मुस्कुराहट के जो मेरे जिगर पे चला रहे हो
तेरी दी चोटो से सर से पेर तलक मै घायल हूँ
धड़कता हुआ दिल मेरा तोड़ दिया तुमने अब मै
बेजान हूँ
कभी जिन्दा था अब लाश हो आया हूँ
अहसास कब्र में दफन कर आया हूँ
होकर दिल के हाथो मजबूर चला आया हूँ
बिन बुलाए तेरी महफिल मे चला आया हूँ
होकर दिल के हाथो मजबूर चला आया हूँ !



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