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मेरे अल्फाज़

मै मोहब्बत हूँ

Sarla Singh

560 कविताएं

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मत रोको मुझे उडने दो
मै हवा हूँ मै औरत हूँ
जितना रोकोगे मुझे मैं उतना
दौडु़गी जितना लगाओगे पहरे मुझ पर
मै उतनी फरार हो जाऊंंगी जितना बांधोगे
दायरोंं मेंं मुझे मैं उतनी फलती जाऊंगी
मै मोहब्बत हूँ ,मै औरत हूँ
चिरकर पत्थर की चटानोंं को मैं
रस्ता बना लूूूंगी बहती नदी हूँ
नीले अम्बर पर जो फलाऊं छटा अपनी
उसे बेरंग कर दूूूं वो घटा हूँ
गिर जाऊं जो जमीन पर मैं जला कर
राख कर दूूूं वो बिजली हूँ
मै कुदरत हूँ ,मै औरत हूँ
धडकते हुए दिल की हसरत हूँ
हर जवा हसीन की मैं चाहत हूँ
बुझाकर शोलों को जो खाक कर दे
मैं वो शबनम हूँ ,मैं औरत हूँ !

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