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मेरे अल्फाज़

इंसा , इंसा का भला नहीं चाहता

Sarla Singh

559 कविताएं

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जिस जहाँ मे ए रब तूने इंसा को इंसा से मोहब्बत बखशी  थी,
उस जहाँ में आकर देखो आज इंसा दूसरे इंसा का भला नहीं चाहता ।



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