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मेरे अल्फाज़

बेबसी किसान की

Sarla Singh

242 कविताएं

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बन्जर जमी
सूखे खड़े पेड़
आग उगलता आसमां
पानी को तरस्ती आँखें
फट रहा सीना धरती का
लहू लोहान है मन्जर सारा
ढेर लगा है लाशााोंं का
रो रो आँखें खाली हो गयी
आस लगाते उम्र हो गयी
रोटी खाए मुद्दत हो गयी
जिन्दगी तो अब बोझ हो गयी
देखो सब लाचारी हमारी
गरीबी निगल गयी खुशियाँ सारी
तमाशा हो गई इज्जत हमारी
बन्जर जमी सूखे खड़े पेड़
आग उगलता आसमां पानी को तरस्ती आँखें !

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