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मेरे अल्फाज़

वो भक्त नहीं

Sanjeev Sharma

40 कविताएं

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वो भक्त नहीं जिसे(सिर्फ)मंदिर में
भगवान दिखाई देता है।
है भक्त वही जिसे कण कण में
रमा राम दिखाई देता है।

भगवान कहां कभी भक्तों से
लेने की इच्छा रखते हैं?
पथभ्रष्ट है वो जो ईश्वर को
किसी भेंट का भूखा कहते हैं।

सारी सृष्टि का मालिक जो;
उसको क्या भेंट दे पाएंगे?
भगवान को रिश्र्वत खोर समझ
चौरासी में जकड़े जाएंगे।

सूरज को पानी देने से
सूरज कब ठंडा होता है?
यदि सूरज ठंडा हो जाए,
हम भी ठंडे (मर)हो जायेंगे।

बिल्ली के रास्ता काटने से
कभी देखा है रेल को थमते हुए?
कोई मारे बेशक दस छींकें
कभी देखी हैं सांसें जमते हुए?

हर दिन भगवान की नेमत है,
नहीं दिन कोई भी होता है बुरा।
रब हाजिर -नाजिर सब देख रहा,
तू व्यर्थ ना आडंबर यूं रचा।

कहीं शुभ- अशुभ के चक्कर में,
कर्तव्य की रेल जो छूट गई।
फिर पछताए कुछ ना होगा,
मत कहना कि किस्मत फूट गई।

जो काम भी करना है तुमको,
तन-मन शत-प्रतिशत दो उसमें खपा।
यदि काम अधूरे मन से हुआ,
फिर निश्चित है कि मिलेगी सज़ा।

मेरे देश के योग्य सपूतों तुम
अंधविश्वास की बेड़ियां सब तोड़ो
दफनाकर रूढ़ियां घिसी-पिटी
विज्ञान से नाता अब जोड़ो।

- संजीव शर्मा( हिंदी अध्यापक)
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय खटौली ( पंचकूला) हरियाणा।

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