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मेरे अल्फाज़

हासिल ये मक़ाम यूं ही नहीं पाया

Sanjeev Sharma

45 कविताएं

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कई बरसों तक तराशा है इसे
हासिल ये मक़ाम यूं ही नहीं पाया।
मैंने रो- रो के रातें काटी हैं।
आंखों में ये रंग तब आया।

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