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मेरे अल्फाज़

लाल मेरे

Sanjeev poswal

11 कविताएं

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एक अरसे के बाद जब
हम आए अपने घर
हो कर रुआंसी माँ बोली
रहने लगा रे अब तू किधर
भूल गया क्या रिश्ता माँ का
क्या तू हो गया है पत्थर

ये दिन मैंने देखे क्यूँ
ममता में मेरी क्या थी कमी
तुझको हरदम मैं याद करूँ
जाए न इन आँखों की नमी
जिसमें माँ न साथ रहे
उसको तुम कहते हो घर

एक अरसे के बाद जब
हम आए अपने घर

गला हमारा भर गया
माँ का दिल पिघल गया
बोली लाल मेरे तू किधर गया
तू तो मेरे मन में ही है सदा
मन मत तू अपना छोटा कर
खुश रहे तू हमेशा ये मेरा वर
चाहे तू फिर रहे जिधर

एक अरसे के बाद जब
हम आए अपने घर

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