आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Mahkta hua Gulistaan Chhod Aaya hun

मेरे अल्फाज़

महकता हुआ गुलिस्तान छोड़ आया हूं

Sanjay Saroj

21 कविताएं

33 Views
महकता हुआ गुलिस्तान छोड़ आया हूं
हे धरती माता तुझ पर होने कुर्बान
सुख के सारे सामान छोड़ आया हूं
मां-बाप के कलेजे का वो टुकड़ा हूं, जो
ना जाने कितने अरमान तोड़ आया हूं
चैन से सोये मेरे मुल्क़ की अवाम
एक छोटा सा पैगाम उन्हें छोड़ आया हूं
दाग लगने न दूंगा तुझ पर मेरे जीते जी
तिरंगे से लिपटा कफ़न ओढ़ आया हूं
बहाकर लहू का एक-एक कतरा
बैरियों के मंसूबे का रुख मोड़ा आया हूं
फिर से जन्म लूं तो माटी हो हिन्द की
मां की बाहों का तरसता हार छोड़ आया हूं


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!