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मेरे अल्फाज़

वजूद

sanjay pradhan

16 कविताएं

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आंधी उखाड़ देती है पेड़
ये तो पता था
अब तो बिना आंधी के भी
उखड़ जाते हैं पेड़
अब पता चला
अनुभव से ज्यादा
बढ़ गया है वजन अपना
फिर भी डरता हूं
सूखे कमजोर पत्ते से भी
कहीं ऐसा न हो
कि वो ले जाए बहा मुझे
कहीं दूर
और मै लौट भी न सकूं
घर अपने
जहां करता है
कोई इंतजार मेरा
इसलिए घर से बाहर
निकलने में भी डरता हूं
हे महात्मा बुद्ध
जरा मुझे बताओ तो सही
कि मै सम्भालू कैसे
अपने वजूद को
क्योंकि अब समय बदल गया है

- संजय प्रधान 

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