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मेरे अल्फाज़

पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं

Sanjay Narayan

66 कविताएं

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हम भी रोये नहीं मुद्दतें हो गयीं।
पत्थरों की तरह आदतें हो गयीं।

जबसे बेताज वह बादशाह बन गया,
पगड़ियों पर बुरी नीयतें हो गयीं।

जख़्म भी दर्द देते नहीं आजकल,
कम सितमगर तेरी रहमतें हो गयीं।

ख़ुशनुमां एक चेहरा दिखा ख़्वाब में,
तबसे जागे न हम मुद्दतें हो गयीं।

थी खबर आदमी हैं उधर राह में,
जो भी गुजरा उसे आफ़तें हो गयीं।

एक मुफ़लिस था वो रोटियां मांगकर,
झोलियां भर गया नेमतें हो गयीं।

शौक जबसे अमीरी का चढ़ने लगा,
जो जरूरी न थीं, जरूरतें हो गयीं।

उसको जो भी मिला चाहने लग गया,
दिल की पूरी सभी मन्नतें हो गयीं।

ले गयीं दाद सब वो सजी सूरतें,
और खामोश सी सीरतें हो गयीं।

दिल भी टूटा जहां ने भी रुसवा किया,
इस कदर मेहरबां किस्मतें हो गयीं।

डूबकर ख़ुद हवस में बिके आदमीं,
मुफ़्त बदनाम ये दौलतें हो गयीं।

वो मुहब्बत में बदनाम तो हैं मगर,
ख़ुश हैं यूं मानिए शोहरतें हो गयीं।

उसको तन्हाइयों ने बिगाड़ा बहुत,
उसकी ख़ुद से बड़ी शोहबतें हो गयीं।

गलियों गलियों जब लड़े आदमी,
तब निशाना फ़क़त औरतें हो गयीं।

मुस्कराकर जो तुम सामने आ गए,
एक पल में जबां हसरतें हो गयीं।

हाथ में हाथ ले साथ हम चल पड़े,
दुनियाभर को बहुत दिक्कतें हो गयीं।

-- संजय नारायण


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