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मेरे अल्फाज़

हर जंग बेवजह थी

Sanjay Kumar Shrivastava

21 कविताएं

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उड़ते आसमां के
बादल हो गये थे;
गुरुर के नशे में
पागल हो गये थे।
दी बुढ़ापे ने दस्तक
तब होश संभला;
बदहवास थे वो
मुंह से बस निकला।
हर जंग बेवजह थी....
हर जंग बेवजह थी....

परेशां हैरान हो
उम्र काटते हैं;
कोई लेता नहीं
अक्ल बाँटते हैं।
देखते हैं वल्द को
दूरियां बढ़ाते;
बेकस ये बेबसी
मन में बुदबुदाते।
हर जंग बेवजह थी.....
हर जंग बेवजह थी....

न हुस्न रह गया
न शक्ल रह ग़ई;
हर दिन सताती
ये अक्ल रह ग़ई।
कदम मिलते नहीं
नई पुश्त ताल से;
बड़बड़ा उठते हैं
अपने इस हाल पे।
हर जंग बेवजह थी....
हर जंग बेवजह थी....

सरकसी के इनके
किस्से नहीं रहे;
महफ़िलों में अब
हिस्से नहीं रहे।
जमाने की भीड़
खुद को खोजते हैं;
कितने अकेले
बस यही सोचते हैं।
हर जंग बेवजह थी....
हर जंग बेवजह थी....

स्वरचित @संजय कवि 'श्रीश्री'
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

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