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मेरे अल्फाज़

स्त्री थी कि हँस रही थी

Sanjay Grover

44 कविताएं

1017 Views
और स्त्री थी कि हँस रही थी

वे ज़रा हैरान हुए कि
उनकी उपस्थिति में भी

अब वे हँसे उसकी हँसी पर
फिर ठिठके

क्यों कि स्त्री थी कि हँस रही थी

अब वे हकबकाए
फिर घूरा उन्होंने ज़ोर से

मगर स्त्री फिर भी हँस रही थी

अब वे हमके, थमके, भभके
अंतत: लपके
कि कुछ कर ही डालेंगे इसका

मगर वह और तेज़ हँसी

अब वे ढूँढ़ा किए यहाँ-वहाँ वो ज़माना कि
जब उनके हँसने से वह
घबरा जाती थी, लाल हो उठती थी,
पल्लू सम्हालती थी,
आख़िरकार रो ही पड़ती थी

मगर नहीं मिला उन्हें कहीं कुछ

और स्त्री थी कि हँस रही थी

- संजय ग्रोवर
147-A, Pocket-A, Dilshad Garden, Delhi-11005


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