आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Ghazal : Tauba-Tauba

मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल : तौबा-तौबा

Sanjay Grover

42 कविताएं

894 Views
ग़ज़ल

समंदर-सी आँखें उधर तौबा-तौबा
इधर डूब जाने का डर तौबा-तौबा

न कर ये, न कर वो, न कर तौबा-तौबा
यों गुज़री है सारी उमर, तौबा-तौबा

वो नज़रें बचाकर नज़र से हैं पीते
लगे ना किसीकी नज़र, तौबा-तौबा

झुके थे वो जितना, हुआ नाम उतना
था घुटनों में उनका हुनर, तौबा-तौबा

मैं टेढ़ी-सी दुनिया में सीधा खड़ा हूँ
गो दुखने लगी है कमर, तौबा-तौबा

यों ज़ालिम ने सारे, चुराए हैं नारे
कि करने लगा है गदर तौबा-तौबा

-संजय ग्रोवर
147-A, Pocket-A, Dilshad Garden, Delhi-110095


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!