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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल : सूरज के पाँव

Sanjay Grover

54 कविताएं

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ग़ज़ल

लोग कैसे ज़मीं पे चलते हैं
देख, सूरज के पाँव जलते हैं

उन्हीं ख़्वाबों में ही तो ज़िन्दा हूं
मेरी आंखों में जो भी पलते हैं

लोग बेहिस घरों के साए में
हम दरख्तों के साथ चलते हैं

लोग होते हैं पर नहीं होते
भीड़ में जब कभी निकलते हैं

धूप अब इनको रास आती है
चांदनी में ये जिस्म जलते हैं

लोग शहरों में जाके बसते हैं
जब कभी उनके पर निकलते हैं

लोग होते हैं क़ामयाब तभी
जब भी अपना-सा बनके छलते हैं

-संजय ग्रोवर
147-A, Pocket-A, Dilshad Garden, Delhi-110095


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