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मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल : मंज़िलों की खोज में

Sanjay Grover

32 कविताएं

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ग़ज़ल

मंज़िलों की खोज में तुमको जो चलता-सा लगा
मुझको तो वो ज़िंदगी भर घर बदलता-सा लगा

धूप आई तो हवा का दम निकलता-सा लगा
और सूरज भी हवा को देख जलता-सा लगा

झूठ जबसे चाँदनी बन भीड़ को भरमा गया
सच का सूरज झूठ के पाँवों पे चलता-सा लगा

मेरे ख़्वाबों पर ज़मीनी सच की बिजली जब गिरी
आसमानी बर्फ़ का भी दिल दहलता-सा लगा

चंद कतरे ठंडे काग़ज़ के बदन को तब दिए
खून जब अपनी रगों में कुछ उबलता-सा लगा

- संजय ग्रोवर
[email protected]

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