आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Ghazal : Khwab Ki Mahfilen

मेरे अल्फाज़

ग़ज़ल ख़्वाब की महफ़िलें

Sanjay Grover

52 कविताएं

1299 Views
ग़ज़ल
तोड़कर सब हदें निकलतीं हैं
फूल से ख़ुशबुएं निकलतीं हैं

प्यार तो आसमान होता है
खुलके सब ख़्वाहिशें निकलतीं हैं

शोर तो बेसबब ही है अकसर
मौन से आहटें निकलती हैं

तेरी दुनिया की भीड़ से बेहतर
ख़्वाब की महफ़िलें निकलतीं हैं

उम्र छोटी-सी लगने लगती हैं
दिल से जब हसरतें निकलती हैं

अब न गहराईयों में जाऊंगा
बारहा दीमकें निकलतीं हैं !

आग़, पानी को फिर डराती है
घरसे जब दुल्हिनें निकलतीं हैं

-संजय ग्रोवर
147-ए, पॉकेट-ए, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-110095


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!