ज़िन्दगी से रू-ब-रू

                
                                                             
                            इतनी भी आसान नहीं हो तुम ऐ ज़िन्दगी,
                                                                     
                            
इतनी भी नादान नहीं हो तुम
ओ ज़िन्दगी।

जब भी सोचता हूँ कि अब कुछ
चीजें होंगी आसान,
मुश्किलें फिर पीछे के दरवाजे से घुस आती हैं दबे पांव।

लेती रहती हो तुम हर कदम मेरे धैर्य का इम्तिहान,
इक मैं हूँ जो संघर्षशील हो कर
जूझता हूँ हर तूफान।

देखा जाए तो तुम 'माँ' से कम नहीं हो ऐ ज़िन्दगी,
सिखाती रहती हो हर कदम नए
नए तरीकों से।

कभी ऐसे सबक देती हो कभी फटकार देती हो,
फिर जब होता हूँ उदास अपना प्यार देती हो।

शायद मैं ही हूँ नादान जो अभी तक समझ न पाया तुझे,
वरना यहाँ तक कौन ले आया
ये भी तो समझा मुझे।

ठीक ही तो कहा है किसी ने कि
जीने का ढंग जब आया,
हुई ज़िन्दगी की शाम,तुम्हें जान
अपना हम होते रहे कुर्बान।

जो भी कहो कुछ खट्टे मीठे से
अनुभव ले कर,
तुम्हें सब जी रहें हैं कुछ कोस कर कुछ मजे ले कर।

हालांकि मेरी हो कुछ पिछले पचपन सालों से तुम,
पर तुम अपना भरोसा न बना पाई हो सकती गुम।

शिकायतें भी हैं नाराजगियां भी
हैं सबको तुमसे,
फिर भी सबको मोहब्बत है तुमसे।

सबको मोहब्बत है तुमसे।
सबको मोहब्बत है तुमसे।।

- संजय भाटिया 
डी एल एफ़ 3,गुरूग्राम।
हरियाणा।


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8 months ago
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