कहीं दूर एक सुबह....

                
                                                             
                            वो देवदार के लम्बे पेड़ों पर कुछ अनजान सी वादियों में,
                                                                     
                            
कई नई प्रजाति की चिड़ियों सँग नयी नयी सी चहचहाहटें
आज सुबह जगा हूँ मैं जब हूँ
कहीं दूर मगर खुद के पास हूँ
प्रकृति की गोद मे संजोए बैठा
हूँ कुछ अविस्मरणीय पल बस
समेट लेना चाहता हूँ इन पलों
को यादों में जीवन भर के लिए
जैसे वो पर्वत शिखर पे सुनहरी
धूप की किरणें दे रही हैं जीवन
प्रकृति को अपनी गर्माहट जैसे
सूर्य देव ने खोला अपना घूंघट
और एक नई तरह का मधुर सा
संगीत पंछियों का सुनकर मन
बस इन्हीं की तरह उड़ने लगा है
कहीं दूर एक सुबह,
कहीं दूर एक सुबह,


'संजय भाटिया'
डी एल एफ़ 3, गुरुग्राम।
हरियाणा।

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2 weeks ago
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