प्रियतम सावन...

                
                                                             
                            वर्षा बावरी,
                                                                     
                            
सावन की बाट जोहे,
साजन को रिझाने को
बूंदों की माला पिरोए।
आंचल में सहेज रही अपने सावन को,
हरियाली से रंग रही अपने मनभावन को।
क्या करूं श्रृंगार कुछ समझ न पाए,
सावन के प्यार में बस मदहोश हुई जाए।
घटाओं के आइने में ख़ुद को निहारे,
बादलों की आड़ से सावन को पुकारे।
इन्द्रधनुष की झूल से बनाया हिंडोला,
गलबहियों में झूमें सावन सलोना।
सावन की मस्ती में वर्षा डूब डूब जाए,
कश्ती में बिठाकर दूर तलक ले जाए।
कजरी गाए और सुनाए मल्हार,
प्रियतम को लुभाने को खोले मन के द्वार।
सावन भी शरमा रहा पाकर अपना मीत,
इंद्रदेव हर्षा रहे देख दोनो की प्रीत।
वर्षा की झोली में डाले सावन ने उपहार,
शिव भक्ति और तीज के झूलों का त्योहार।
सावन के आगोश में वर्षा सहम- सहम जाए,
हाय! मेरा सावन मुझसे दूर चला न जाए।

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3 years ago

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