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मेरे अल्फाज़

२१ दिन की ही तो बात है

Sandeep Gupta

4 कविताएं

सड़कें सूनी, गलियां सूनी,
चौराहे खड़े उदास,
कई दिनों के बाद है लौटी,
घर पे रौनक़ आज।

खुलकर-खिलकर हंसले बंधु,
खुलकर-खिलकर जी ले बंधु,
परिजनों के संग बैठ,
चख ले जीवन की मिठास।

कुल जमा दिन २१ ही है,
कर्फ़्यू जी के पास।
कुल जमा दिन २१ ही है,
और तुम्हारे पास।

घर के अंदर ही रहकर बंधु,
घर के अंदर ही रहकर बंधु,
करना है कोरोना पर प्रहार।
घर के अंदर ही रहकर बंधु,
जीतना है मैदान-ए-जंग इस बार।

सड़कें ख़ाली रहने दो!
गलियां ख़ाली रहने दो!
चौराहों को रहने दो उदास!
२१ दिन लगातार।

२१ दिन के बाद,
निकलोगे जब तुम बैखोफ़ बाहर,
सड़कों, गलियों, चौराहों पर,
फिर से छा जाएगी बहार।


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