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मेरे अल्फाज़

माली को ही जब बैर नहीं है

Salil Saroj

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माली को ही जब बैर नहीं है
खिले और अधखिले फूलों से
फिर हमने कैसे अलग कर दिए
इन्हें अपने कायदे और उसूलों से
जब रंग एक है और बू एक है
फिर चमन कैसे उजड़ा उल-जुलूल दलीलों से
वही मिट्टी है और वही पानी है
फिर कैसे बिखड़ी जड़ें फावड़े और कीलों से
बगीचे में है हिस्सा दोनों का ही बराबर
फिर क्यों बाँटें ज़मीन नफरत और मशालों से
खुद भी महकें ,औरों को भी महकाएँ क्योंकि
गुलशन बनता है हर एक तरह के गुलों से।।

- सलिल सरोज

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