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मेरे अल्फाज़

बर्बाद गुलिस्ताँ

Salil Saroj

706 कविताएं

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नदियों से पानी भी चुरा लेता है वो
और खुद को इंसाँ बुला लेता है वो

जंगलों में लगाके आग कितना खुश है
और वजह पूछने पे दिल बुझा लेता है वो

सूरज अँधा,चाँद गर्म तवे सा तपा हुआ है
और अपने छत पे कितने अरमाँं उगा लेता है वो

खेतों से फसलों के लाशों की बू आने लगी हैं
और न जाने किस तरह वैशाखी मना लेता है वो

पर्वतों के शरीर चीथड़ों से भर रखे हैं अब तो
और गोद में अपने चाँदनी कैसे सुला लेता है वो

हवाओं के होंठों पे खूँ के छींटों को छूते ही नहीं
और बन्द कमरों में कितने ख्वाब खिला लेता है वो

आसमान मलिन कर दिया कारखानों के धुओँ से
और खुद के चेहरे को दूध से धुला लेता है वो

क्या हवस है ये,ये कैसी दरिंदगी है,पता नहीं
जिसने जन्म दिया,उसी को मिट्टी में मिला लेता है वो

सलिल सरोज
कार्यकारी अधिकारी
लोक सभा सचिवालय
संसद भवन,नई दिल्ली


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