आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   कूबत

मेरे अल्फाज़

कूबत

Salil Saroj

616 कविताएं

239 Views
जो मकाँ बनाते हैं,वो अपना घर नहीं बना पाते
रेगिस्तान में उगने वाले पौधे जड़ नहीं बना पाते

जिन्हें आदत हैं औरों के रहमो-करम पे जीने के
वो कूबत होते हुए भी अपना डर नहीं बना पाते

जो पहचानते हैं इंसानों को सिर्फ औकात से
वो कभी किसी के दिल तक दर नहीं बना पाते

जो परिन्दे डरते हैं हवाओं के बदलते रूख से
वो सारे उड़ने के लिए अपना पर नहीं बना पाते

जिनकी जवानी बन गई जीहुजूरी का दूसरा नाम
वो ज़ुल्म के खिलाफ उठने वाला सर नहीं बना पाते

सलिल सरोज




हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सर्वाधिक पढ़े गए
Top

Other Properties:

Disclaimer

अपनी वेबसाइट पर हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर अनुभव प्रदान कर सकें, वेबसाइट के ट्रैफिक का विश्लेषण कर सकें, कॉन्टेंट व्यक्तिगत तरीके से पेश कर सकें और हमारे पार्टनर्स, जैसे की Google, और सोशल मीडिया साइट्स, जैसे की Facebook, के साथ लक्षित विज्ञापन पेश करने के लिए उपयोग कर सकें। साथ ही, अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।

Agree
Your Story has been saved!