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मेरे अल्फाज़

रफ वही

Saikh Alam

49 कविताएं

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पहले नादानी लिखी थी,
बाद में मनमानी लिखी थी...
बड़े प्यार से अल्हड़ जवानी लिखी थी !

आप ढूंढ रहा हूं उस रफ वही को,
घर के कबाड़खाने में,
कभी जो उसमें जिंदगानी की निशानी लिखी थी !

किधर खो गई वह रफ वही जो गुस्से को छुपाए मेहरबानी करती थी,
कभी चुगलखोरी के साथ याद दिहानी करती थी!

कुछ अलग से तेरे नाम के वर्क थे ,
कुछ तुमसा उस में छुपाए रखा था ,
पता नहीं यह वक्त उसे कहां उठा ले गया!
बड़ी काम की थी मेरे लिए वह रफ वही....

वादे थे उसमें कुछ ढके हुए ,
कुछ तोहफे थे उसमें दबाए हुए,
खुशियों का भी एक कोना था,
गमगीन शेरो का चालीसा था !

थक कर हार गया हूं...
तो भी नहीं मिलती मुझे वह मेरी रफ वही...
शायद उम्र खा गई उसे?
 

शेख आलम
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