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मेरे अल्फाज़

कल फिर मिलेंगे

Saikh Alam

45 कविताएं

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ढलती शाम और पनघट में डूबता सूरज, कल फिर मिलेंगे,
नया उजाला लेकर, नया सफर लेकर,
कल फिर मिलेंगे!

अब तो गोता खाने दो मुझे अंधेरी नहर में,
चंदन टीका उभरा है मस्ती भरी सहर में,

आज की रात कर्म का बोझ हल्का करने दो
कल फिर मिलेंगे नए उमंग के साथ नए दिशा के साथ कल फिर मिलेंगे

नीली पड़ती हैं शाम, दिन भर धूप का ज़हर खाकर,
मैं यूं ही जिन्दा होता हूं, रात के गोद में मर कर,
फिर भी जीवन जिएंगे,
फिर उजियारा करेंगे,
कल फिर मिलेंगे
नये ध्रुव के साथ,
नये बदलाव के साथ
कल फिर मिलेंगे

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