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मेरे अल्फाज़

सुनो दिल्ली

Sahil Mishra

31 कविताएं

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अंधों की बस्ती ने
मुझे चलना सीखा दिया
इक तेज़ाब सी बारिश ने
मुझे पिघलना सीखा दिया
मैं हैरान था मुस्कुराते चेहरों को देखकर
फ़रेबी चेहरों ने मुझे संभलना सीखा दिया
अंधों की बस्ती ने
मुझे चलना सीखा दिया।

किताबों में शब्द धुंधले हो रहे थें
चमचमाती इमारतों ने मुझे पढ़ना सीखा दिया
मैं उठा ही था अपने बेबसी के आलम से
मुफ़लिसी के ठोकर ने मुझे गिरना सीखा दिया
अंधों की बस्ती ने
मुझे चलना सीखा दिया।

नज़रें जहां भी गईं सब रोते ही दिखे थे
उन मगर्मक्ष के आंसुओं ने मुझे हंसना सीखा दिया
मोहब्बत का दरिया कठिन था बहुत
नफ़रत के समंदर ने मुझे तैरना सीखा दिया
अंधों की बस्ती ने
मुझे चलना सीखा दिया।

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