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मेरे अल्फाज़

शायद प्रेम में

Sahil Mishra

158 कविताएं

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तुमने प्रेम में गुज़रना
मैंने ठहरना सीख लिया
शायद इस प्रेम को
यहीं से शुरू
और यहीं पे ख़त्म होना था

अगर साथ चलते तो
नहीं समझ आता
रुक कर, आगे बढ़ जाने का साहस
साथ रुकते तो
नहीं समझ पाते
छोड़कर जीने का दुःख
साथ होते तो, नहीं समझ पाते
साथ न होने की बेचैनी

अच्छा हुआ कि
सब जल्दी हो गया
मैंने कहना और
तुमने चुप रहना सीख लिया
शायद इस प्रेम में
इतना ही कहना
और इतना ही सुनना था
शायद इस प्रेम को
यहीं से शुरू
और यहीं पे ख़त्म होना था..


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