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मेरे अल्फाज़

कागज...

SACHIN BAJPAI

37 कविताएं

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छिप- छिप कर कोलाहल में, वो प्रतिध्वनि बढ़ाते हैं
है साजिश का खेल कोई, या प्रतिभा कोई दिखाते हैं।
कागज की नावों में जब, नाविक आभासी दिखते हैं
लहरों की चाल जो बदली, खुलकर कागज ही बहते हैं।
इन कागज का अन्तर तो बस, तभी समझ में आता है
जब कोई धागे से बंधकर, निडर गगन में जाता है।
और कोई जब साँसे थाम कर, पानी में पैर बढाता है
तब लहरों का स्वाभिमान भी, इनके आगे झुक जाता है।
कैसे भेदे कोई ये साजिश, जो गुमनामी में परखी जाती हैं
हर मौके को खेल बना, बस जीत का जश्न मनाती है ।
कागज जब खाली होता है, विश्वास खूब झलकता है
शब्दों ने घेरा जब उसको, कई राज संजोये रखता है।
कहीं किसी खास का नाम लिखा,कहीं लिखा नाम है कटा हुआ
कहीं प्रिय जनों के चित्र छपे, कहीं प्रेम पत्र है फटा हुआ।
कागज सा हो जाए जीवन, हर रूप में बखूबी ढल जाता है
कितना कोई भी लिख जाये,फिर भी कागज कहलाता है ।।


-सचिन बाजपेयी

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