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मेरे अल्फाज़

सच्ची मुहब्बत

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कहानी जो कही जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।
नुमाई जो करी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

न किस्सा है कहानी है, कभी तो आसमानी है,
सुनाई जो कभी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

लगा पहरा कहां इस पर, नहीं डाका पड़ा इस पर,
लुटाई जो कभी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

धड़कती धड़कनों में जो, नहीं पल में क्षणों में जो,
बुलाई जो कभी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

सुबह की जो ख़ुमारी हो, दिलों की जो शुमारी हो,
भुलाई जो कभी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

न बटुआ ना कमाई है, ख़ुदा की ये ख़ुदाई है,
गुमाई जो कभी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

न लौ ये टिमटिमाती है, कभी ये बुझ न पाती है,
बुझाई जो कभी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

कलम की नीब है थकती, कहानी सब कहां कहती,
सुझाई जो कभी जाये, मुहब्बत हो नहीं सकती।

© रजनीश "स्वच्छंद"


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