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मेरे अल्फाज़

यक्ष प्रश्न - मैं चला जाऊं तो ?

Rupesh kumar

5 कविताएं

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यक्ष प्रश्न
मैं चला जाऊंगा तो ?
इंसान हमेशा इस प्रश्न का ढूंढता है उत्तर
सोचता है होके दम्भी और अभिमानी
मुझे कुछ नही होगा वरदान है मुझपे आसमानी,

दूसरे ही जाएं मुझे किसी की जरूरत नही,
हाँ मैं न रहूं तो उनकी जिंदगी जिंदगी नही,
मैं ही अच्छा मैं ही सच्चा मेरी अधिक बुद्धिमानी,
मेरे बिना दूसरों की जिंदगी बेरंग और बेमानी,

सच का आइना खुद से देखो,चुप चाप रह जरा दूसरों को पहचानो,
कोई अगर चुपचाप रह तुम्हारी हरकतों को सहता है,
तो ये नहीं की वो तुमको नही पहचानता है,
हर चीज की एक सीमा होती है,
बस कुछ अच्छा होगा तुममे ये सोच के चुप रहता है,
इतनी भी अकड़ मत दिखाओ की सही गलत का फर्क खतम हो जाये,
सुंदरता ,विद्वता धरी के धरी रह जाये,

याद रखना जाना तो सबको है, 
न कोई किसी पे निर्भर है, 
मैं चला जाऊं तो,ये मत सोच पगले,
सोच की कोई प्रिय चला जाये तो?

तुम सोचते होगे की उसे भी तो जाना ही है,
सच है, मगर क्या अभी अचानक जाए तो?
फिर क्या करोगे अकड़ का?
अपने इर्द गिर्द बनावटी मतलबी दुनिया का,

मतलबी दुनिया,हां है ये सच्चाई,
बहुत कम देखते हैं आपमे अच्छाई,
मतलब है जबतक आपके जिस्म,या पैसों की
सब होंगे शामिल सूची में आपके अपनो की,

अगर ये भी नही पता चलता है आपको
तो बस सोचते रहो आप की मैं चला जाऊं तो।।

आज के दौर में मानव के अकड़ को दर्शाती एक कविता,
उन लोगों को समर्पित,जो ये सोचते हैं कि हम हैं तो रिश्ते हैं और सामने वाला इंसान।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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