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मेरे अल्फाज़

कैसे ये अपने

Rupali Srivastava

7 कविताएं

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कुछ खंजर से मार देते हैं,कुछ फुसलाकर मार देते हैं,
ये अपनों के करम है जनाब,नज़र ना रखो तो ये हलाल मार देते हैं ।।

गमें आशिक के जनाजे को कौन पहुंचे बेसबर,
जो पासबां बने ,यहाँ उसे सब तिल तिल कर मार देते हैं।।

खामोशीयाँ ओढ़कर जो नजरअंदाज कर रहा सब,
बेगैरत लोग उसे जली कटी सुना, उकसा के मार देते हैं।।

पहलु में हर किसी के हैं एक बेजा आदमी,
अपनी सम्भलती नहीं, बस दूसरे की बखिया उधेड़ देते है।।

कुछ दिल अज़ीज ऐसे भी ढीठ हैं, क्या कहने ,
सब करवा कर,कभी कुछ किया ही नहीं, कह कहकर मार देते है।।

अजी मारने वालों की कुछ ना कहिए जनाब,
जो जान से मारने पर आ जाए तो एहसान तले मार देते हैं।।

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