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मेरे अल्फाज़

गुलाब

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कांटो के बीच में वो हरदम मुस्काता है|
सुरभी से अपने सारा उपवन महकाता है||

सहता है शीत घाम शुष्क झंझवातों को|
शिकवा न करता कोई तोड़े या काटे तो||

हार बनाता हो चाहे सेज पर सजाता हो |
इत्र बनाता हो या भगवान को चढ़ाता हो ||

उसको पता कैसे खुद को समझाना है|
विपरीत हालात में वजूद को वचाना है||

त्याग व तपस्या की मूक वो रवानी है|
फूलों के राजा की छोटी सी कहानी है||

गम को सहो हंसकर सबको सिखलाता है|
वो तो हर हाल में बस मूक मुस्कुराता है||

-मंटू

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