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मेरे अल्फाज़

ढूंढता फिर रहा उसको शामों सहर

Rohit Singh

44 कविताएं

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ढूंढता फिर रहा उसको शामो सहर,
वो मुझ में बसा मुझे नहीं कुछ खबर |

मिलने की ख़्वाहिश थी उससे मिला भी मगर,
मुड़ गया देखकर फिर न आया नजर |

वो था तब घर में रौनक सी रहती थी,
अब ये आलम है गया चारों समत अंधेरा छोड़कर |

लुटा रहा होगा मेरे हिस्से की मोहब्बत गैरों पर,
चला जो गया है मेरा दिल तोड़ कर |

रोज जाकर ढूंढ़ती हैं नजरें उसे उसी मोड़ पर,
जहां से गया था वो मुझको अकेला छोड़कर |

मुंतजिर है दिल को उसका और उसकी मुहब्बत का आज भी,
गले से लगा लुंगा जो लौट आया अगर |

जब तक सांसें हैं यहां आता रहूंगा,
क्या पता 'रोहित' किस रोज आ जाये नज़र |

- रोहित सिंह (सुल्लतानपुरी)

सहर - सुबह 
मुंतजिर - इंतज़ार 
ख़्वाहिश - इच्छा, लालसा
चारों समत - चारों तरफ

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