जब फ़ुरसत से बैठकर वो बातें याद करते हैं

                
                                                             
                            जब फ़ुरसत से बैठकर वो बातें याद करते हैं
                                                                     
                            
यूँ मायूस सा होकर मेरा दिल रो सा जाता है
सब कुछ खो सा जाता है

बात करते-करते कह जाना सब कुछ
फिर मैंने क्या कहा
ये कुछ चुभ सा जाता है
सब कुछ खो सा जाता है

वो हंसी वादे सब झूठे से लगते हैं
याद करते-करते सब कुछ मिट सा जाता है

जा मुकर जा तू भी बातों से अपनी
पहाड़ों को देख हवाओं का रुख मुड़ सा जाता है

जब फ़ुरसत से बैठकर वो बातें याद करते हैं
यूँ मायूस सा होकर मेरा दिल रो सा जाता है
सब कुछ खो सा जाता है

- रोहित अग्रवाल

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
1 month ago
Comments
X