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मेरे अल्फाज़

क्या भूलूं क्या याद करूं

Ritesh Singh

1 कविता

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जिन्दगी के सिरहाने से,
कठिनाइयों का अंबार था।
कुछ पल लोग खफा होते,
कुछ पल मैैैं खफा होता था,
क्या भूलूं क्या याद करूं ?
जब से जीवन में आया,
कठिनाइयों का अंबार था ,

कभी न मैं लोगो को समझता
और कभी न वे मुझे समझते,
फिर भी इस संसार में एक
बड़ा सा सपना लिए बैठा था।
क्या भूलूं क्या याद करू??

लेखक- रितेश कुमार सिंह
Students BHU m.com
I.N.gurtu hostel
Varanasi (221005)


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