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मेरे अल्फाज़

मोहब्बत के दिन मुझको याद आ रहे हैं...

Rishi Dikshit

2 कविताएं

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(मोहब्बत के दिन मुझको याद आरहे है )

कहु चाँदनी को बहुत खूबसूरत
तो चंदा पर वो खूब इठला रहे है
चूड़ी पहन कर ना निकलो गली से
मोहब्बत के दिन मुझको याद आ रहे है!!

घटाए जो घिर सी गई आसमा पर
तो बरसात भी गुफ्तगू कर रही है
मिट्टी की खुसबू न आओ यहां पर
हमे जिस्म उनका याद आ रहा है !!

वो जुल्फे थी उनकी हवाओँ ने जिसको
बहुत देर तक उलझा कर रखा
बारिश की बूंदे ना छुओ अब मुझको
छुवन वो हथेली की याद आ रही है !!

कैसे कहु वो लजीजे-वफ़ा थे
महीनों से उनकी खबर ना मिली है
मुस्कुराता हुआ तुम चेहरा दिखाओ
की रोता हुआ प्यार याद आ रहा है !!

ख्वाबो में आती है परिया मेरी अब
खूबसूरत नही है , ना वो है तिलिशमी
शहरों की गालिया वीरानी हुई है
उनके वो वादे याद आ रहे है !!

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