मैं और वहम....

                
                                                             
                            आज फिर हार गई मैं
                                                                     
                            
जीत गया मेरा वहम
बैठा है जो वर्षों से दिल में घर कर
हल्की - सी चोट और निकल आता है बाहर
मैं बार - बार उससे जीतने की कोशिश में रहती हूं
पर नहीं,
कानों में पड़ते हैं शब्द और एक अंधेरा-सा छा जाता दिलोदिमाग में,
हारी हुई मैं अवचेतन अवस्था में
जाने क्या सोचती लगती हूं ,
गूंथने लगती हूं शायद वर्षों के उन सभी घटनाओं को
जिसने मुझे हराया है और
लगाई है पूरी ताकत वहम को जिताने में,
यही सोचते हुए सो जाऊंगी और
अगले दिन फिर शुरू करूंगी नए वहम को
दिल में जगह देकर उससे जीतने की कोशिश 
मानो जीने के लिए वहम जरूरी हो गया हो जैसे 
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7 months ago

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