आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   stri

मेरे अल्फाज़

स्त्री

Rekhsingh Bhati

4 कविताएं

17 Views
अपने घर की चार दीवारी हैं स्त्री
अपने बच्चों की हंसी, कीलकारी हैं स्त्री
कैसे मान लूं के अबला नारी हैं स्त्री
हिम्मत है अपनी छत (पति) की,
प्रेरणा हैं अपने आंगन (बच्चों ) की
हैं कोमल, मगर कमजोर नहीं
मां दुर्गा का रूप सिंह सवारी हैं स्त्री
नहीं सहमत के अबला नारी हैं स्त्री
घूमता हैं स्त्री के ही ईर्द-गिर्द
उसका घर -परिवार
इस संसार की रचनाकारी हैं स्त्री
कैसे कह दूं के अबला नारी हैं स्त्री
पति के कपडे, जूते, दस्तावेज
बच्चों के खिलौने, टिफिन, अध्ययनमेज
सब मे थोड़ी-थोड़ी उगी हुई ज्वारी हैं स्त्री
क्यूं कहते लोग के अबला नारी हैं स्त्री
मायके की मनुहार भाई-बहनों का प्यार
ससुराल की इज्जत बहुआरी हैं स्त्री
एक साम्राज्य हैं ये उसका घर-परिवार
राजधानी रसोई पर उसका पूर्ण अधिकार
इस साम्राज्य की रानी हैं स्त्री
बहुत हिम्मतवान सबला नारी हैं स्त्री

रेखा भाटिया वैशाली नगर,
अजमेर (राजस्थान)


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!