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मेरे अल्फाज़

निगाहें फेर न ऐ किस्मत...

Ravindra Shrivastava

30 कविताएं

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निगाहें फेर न ऐ किस्मत,
की माद्दा हम भी रखते हैं,
तु रूठ भी जाए तो क्या,
तुझे मनानें का कायदा हम भी रखते है...

अपनें को न समझ बड़ा,
तू खुद मेहनत की बैसाखी पर है,
बंदों के पसीनों के आगे,
तेरा औकात ही ख़ैराती पर है...

जोश, जुनून के वश में तुम हो,
गुमसुम और चुप अब क्यूँ हो,
क्या हुआ तेरे बेअदब गुरुर को,
पल में फ़ना हुई, देख बंदे की सुरूर को...

तुम किस सपनें में खोए हो,
मुँह फेर यूँ मुझसे सोए हो,
कुपित नहीं हूँ इसपर तुमसे,
होनी को तो होनी है मुझसे...

माना कि मंजिल मिलों दूर है,
फिर भी कोशिश हम करते है,
वो वक़्त भी आएगा की खुद बोलोगे,
नतमस्तक हम करते है..नतमस्तक हम करते है...

- रविन्द्र श्रीवास्तव
छपरा, बिहार

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