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मेरे अल्फाज़

देख के देखता ही रह गया

Ravinder Raghav

34 कविताएं

564 Views
तुम को देखा था पड़ोसी की बारात में
ओर देख के देखता ही रह गया

सोचा तुम्हें मेनका कहूं या उर्वशी
ये सोच के सोचता ही रह गया

नज़र मिला कर फिर तुमसे
नज़र मिला के नज़रों में ही रह गया

नज़र मिला के तुमने प्रेम दीप जला लिया
प्रेम दीप जल के जलाता ही रह गया

गलियों में मिलकर तुमसे
तेरी गलियों में ही रह गया

सपनों में मिलकर तुमसे
तेरे सपनों में ही रह गया

अंत में तुम को देखा दुल्हन के लिबास में
ओर देख के देखता ही रह गया


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