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मेरे अल्फाज़

एक छोटी सी आशा

Ravinder kaur

17 कविताएं

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मन की गहराइयों में
एक छोटी आशा चंचल
बालिका-सी खेलती रहती है l

मन कहता है उसकी
उंगली पकड़ दूर तक
चलती जाऊं
खूब बातें करूं उससे
उसको बढ़ते देखूँ l

मगर वो डरती है पल-पल
भागती है दूर मेरी छाया से
मन से बाहर हक़ीक़त की
दुनिया में विचरने से घबराती है l

उसको लगता है जैसे
इस संसार में नहीं है
उसके अस्तित्व का कोई स्थान
क्योंकि खोखले आदर्शों के
कितने ही हाथ उठते हैं
उसकी ओर जो
दबा देना चाहते हैं
उसका गला
नकारात्मक मानसिकता
पैरों तले रौंदना चाहती है
उसका जिस्म l

खुद को बचाने की
जद्दोजहद में भागती-भागती
छोटी सी आशा खो जाती है
गुमनामियों की भीड़ में
सुनती हूँ मैं उसका चित्कार
छोड़ दो मुझे
बचा लो मुझे
बड़ी कोशिश करती हूँ
उसे विश्वास में लेने की
पर फिर भी उसकी
आँखों की पुतलियाँ मांगती हैं
मुझसे एक वचनबद्धता
इस दुनियाँ में एक सुरक्षित आश्रय
फलने-फूलने का अवसर
एक ऐसा संसार जिसकी स्वस्थ,
सकरात्मक और निरपेक्ष मानसिकता हो l

- रवींद्र कौर

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