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Vo bhi kya din the

मेरे अल्फाज़

वो भी क्या दिन थे

Ravi Prakash

26 कविताएं

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एक दौर था जो मेहमा के आने से खुश होते थे हम,
झोला पकड़ना, जूते छुपाना, कसमें देना, रोकने को सब करते थे हम,
अजीबो गरीब जोश और अपनायत थी, उस जिद में,
हक़ लेने और हक़ देने की जोर आजमायिस थी, उस जिद में,
तालीम से तरक्की का सफ़र कुछ इस तरह हुआ,
स्कूलों से सिर्फ किताबी ज्ञान ही मयस्सर हुआ,
मोहल्ले के जिगरी दोस्तों का वो सिर्फ जान पहचान वालों में बदलना,
यही है इस युग की उपलब्धि, अकेले जीना और अकेले मरना,
ऐ काश खुदा तू फिर से हमें एक सामाजिक प्राणी बना दे,
इस भागती जिंदगी से थोड़े दिन का तो रज़ा दे।।

रवि श्रोत्रिय
बरेली, उत्तर प्रदेश

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