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मेरे अल्फाज़

स्वयं ही स्वयं को पहचानें 

Ratna Pandey

161 कविताएं

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क्या कर रहे हो तुम, स्वयं के अंदर झांको,  
पहचान सको अगर तो स्वयं को पहचानो,

अपने अंदर एक अच्छा इंसान अवश्य मिलेगा,
ख़त्म कर खलनायक, नायक से रिश्ता बांधो,

अब तक भला बुरा जो किया स्वयं उसको जांचो, 
जो हो गया वो बात गई, आगे की राह को संवारो,

उचित और अनुचित, जीवन के यह दो पहलू हैं,  
उचित नीति के संग है, अनुचित अनीति के संग,  

नहीं ज़रुरी कर्ण बनकर, सब कुछ तुम दान करो,
नहीं ज़रुरी कृष्ण बन स्वयं गीता की रचना करो, 

आदर्श इंसान बन, स्वयं में अच्छी कहानी बनो, 
नज़रें स्वयं से मिला पाओ, ऐसे तुम इंसान बनो, 

दर्पण जहां हमें, हमारे तन से रूबरू करवाता है, 
स्वयं का प्रतिबिंब, वहां मन से भी तो मिलवाता है, 

सौंदर्य प्रसाधनों से जैसे तन की सुंदरता बढ़ाते हैं,  
वैचारिक भावनाओं से, वैसे ही मन को भी निखारें। 

-रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)


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