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Mukdarshak

मेरे अल्फाज़

मूकदर्शक

Ratna Pandey

116 कविताएं

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विधि का विधान नहीं है यह, जो पाप यहां हर रोज़ होता है,
पापियों का है बड़ा जमघट जो इन घटनाओं को अंजाम देता है
नौ महीने कोख में रखकर जन्म देती है जो नारी,
उसी को अपनी वासना का शिकार बनाते हैं दुराचारी।

हो रहा है अन्याय धरा पर दिन प्रतिदिन,
बीत रही हैं घड़ियां यहां दिन गिनगिन
ना जाने कब किसकी बारी आयेगी कुछ नहीं है निश्चित,
परिवारों के चिरागों की बलि चढ़ती जायेगी,
इस कलयुग में यह है मुमकिन
कांप जाती है धरा, उसके ऊपर ही होता है पाप यहां
गगन ऊपर से रोता है ,नहीं दे पाता है पापी को सज़ा।

हो रहे हैं बलात्कार कभी चोरी से,
कभी सीनाजोरी से
जानता है बलात्कारी कि बीच में कोई नहीं आयेगा,
मेरा सामना यहां कोई नहीं कर पायेगा।

चीखें सुनकर किसी अबला की,
कोई बहरा तो कोई गूंगा बन जायेगा
ख़त्म हो गई होगी आँखों की हया जिसकी,
वह उस घटना का वीडियो बनाकर दुनिया को दिखायेगा।

मुझे क्या करना है कहकर कोई वहां से गुज़र जायेगा,
और कोई नहीं है यह मामला मेरे परिवार का
सोचकर चैन की बंसी बजायेगा।

मेरे ना सही किसी परिवार की तो है यह बेटी ,
यह धारणा यदि इन्सान के दिल में बसेगी ,
तभी ऐसी घटनाओं पर लगाम लग सकेगी।

हो रहे हैं शोषण कभी नादान बचपन के,
कभी अल्हड़ जवानी के
मौन व्रत धारण करके बैठे हैं तमाशाई,
हैं बड़े बेग़ैरत जो सब देखकर अन्जान बनते हैं,
मर्दानगी पर जो अपनी बड़ा ही नाज़ करते हैं,
नहीं बचा सकते किसी अबला की जो आबरु,
वह इस समाज को ही नहीं पूरे देश को शर्मसार करते हैं।

बदनाम है रावण मगर मर्यादा में रहा था वह
आज ना जाने कितनी ही सीता बरबाद होती हैं बाज़ारों में ,
दिन दहाड़े लुटती हैं वह भीड़ से भरी राहों में
अब नहीं कोई राम आयेगा रावण को हराने को।

मूक बने दर्शक से नहीं कोई उम्मीद है रखनी,
अब तो हर सीता को ही रक्षा करनी पड़ेगी स्वयं अपनी
कर नहीं पाती हैं अबला सामना,
हैवानों की गिरफ़्त में फंसकर
छोड़ जाती हैं अपनी देह,
इस हैवानियत से जूझकर।

है भगवान से यह प्रार्थना कि नारी को इतनी शक्ति दे,
कि जब हो रहा हो ज़ुल्म उन पर,
वह माँ काली का रूप धर पाये,
काटकर शीश हैवानों के,
उनकी माला चौराहे पर लटकाये,
ताकि पापियों को यह पैगाम मिल जाये
कि बस अब और नहीं, वरना अगला शीश तुम्हारा होगा,
कि बस अब और नहीं, वरना अगला शीश तुम्हारा होगा।

-रत्ना पांडे

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