आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Mere Alfaz ›   Mere Muktak
Mere Muktak

मेरे अल्फाज़

मेरी रचना से कुछ मुक्तक

Rathee Sachin

1 कविता

26 Views
मोहब्बत के सिवाय तो, कुछ और काम नहीं करना 
यात्राएं तो कर ली है, अब कोई धाम नहीं करना 
हो जाए मुकम्मल तो, ख्वाहिश बस ये मेरी है 
अब तो बिन इजाजत के, कोई भी काम नहीं करना।

पगली इन अदाओं को, मैं तेरी याद लिखता हूँ 
फनकारों के बाजारों में, मैं हर रोज बिकता हूँ 
मोहब्बत की फिजाओं में हुआ क्या मैं तेरे काबिल?
मेरे हिस्से की रौनक भी, मैं तेरे नाम करता हूँ।

के! वो नाराज है मुझसे मैं आँखें चार करता हूं 
ऐतबार है मुझे तुझ पर, बस इतनी सी बात करता हूं 
जायज है तेरा गुस्सा ...जायज है तेरा लड़ना 
पर मोहब्बत में खुशामद तो, मैं ही हर बार करता हूँ।

 बड़ा मशहूर है वो, मगर इन किस्सों से इंकार करता है 
नवाजिशें हैं ये शोहरत की, जिन्हें बेकार करता है 
बहुत ही दूर है वो इन सबसे, बहुत ही दूर है
मिलन की मूरत को मगर साकार करता है।

किताबों ओर कहानी में सब बेकार किस्से हैं,
मेरा और तुम्हारा प्रेम तो केवल, इस जीवन के हिस्से हैं
होना है मिलन तो फिर ... हो जाए, मगर जाने
तड़प का क्यूं ये बंटवारा, केवल हमारे ही हिस्से हैं।


- ड़ा. अनिरुद्ध चौधरी
 ई-मेल:- sachinrathi45@gmail.com
 9759163675

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।


 
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!